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Dravyaguna Vigyana – Ch 1 Concepts of Dravyaguna Vigyana Notes – BAMS – 2nd Year (NCISM)

Dravyaguna Vigyana

द्रव्यगुण विज्ञान – अध्याय 1: द्रव्यगुण विज्ञान (Dravyaguna Vigyana)

Dravyaguna Vigyana – Notes BAMS – 2nd Year According To New NCISM Syllabus

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1. द्रव्यगुण विज्ञान का परिचय (Introduction)

  • द्रव्यगुण विज्ञान: आयुर्वेद की महत्वपूर्ण शाखा जो औषधीय पदार्थों (dravya) के गुणों (guna), कर्मों (karma), और चिकित्सकीय उपयोग का व्यवस्थित अध्ययन करती है।
  • उद्देश्य: रोगों के उपचार हेतु औषधियों का सही चयन, तैयारी, और प्रयोग।
  • शाब्दिक अर्थ:
    • द्रव्य: पदार्थ (जड़ी-बूटियाँ, खनिज, जंतु उत्पाद)।
    • गुण: पदार्थों की विशेषताएँ (गुरु, लघु, शीत, उष्ण आदि)।
    • विज्ञान: व्यवस्थित ज्ञान।
  • परिभाषा (आ. प्रि. श.):
    “द्रव्याणां नामरूपाणि गुणकर्माणि सर्वशः। प्रयोगाश्च वर्ण्यन्ते यस्मिन् द्रव्यगुणं हि तत्।”

    • अर्थ: द्रव्यों के नाम, रूप, गुण, कर्म, और प्रयोग का सर्वांगीण अध्ययन करने वाला शास्त्र।

2. द्रव्यगुण के पदार्थ (Constituents of Dravyaguna)

  • सप्त पदार्थ:
    1. द्रव्य (Substance): चिकित्सा में उपयोगी पदार्थ (उदा. हरड़, आँवला)।
    2. गुण (Properties): द्रव्य के गुण (गुरु, लघु, शीत, उष्ण)।
    3. रस (Taste): स्वाद (मधुर, अम्ल, कटु, तिक्त, लवण, कषाय)।
    4. वीर्य (Potency): शक्ति (शीत, उष्ण)।
    5. विपाक (Final Transformation): पाचन के बाद परिणाम (मधुर, अम्ल, कटु)।
    6. प्रभाव (Specific Potency): विशिष्ट प्रभाव (दीपन, पाचन)।
    7. कर्म (Action): शरीर पर प्रभाव (वातहर, पित्तहर)।
  • नोट:
    • वैशेषिक दर्शन: प्रभाव को वीर्य में शामिल, hence 6 पदार्थ।
    • भवप्रकाश (भा. प्र. पू. मि. 6/169): 5 पदार्थ (रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव)।

3. द्रव्यगुण के अंग (Six Divisions of Dravyaguna)

  1. नामरूपज्ञान (Pharmacognosy): द्रव्यों के नाम, रूप, कुल, स्थूल-सूक्ष्म रचना।
  2. गुणज्ञान (Study of Properties): गुण, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव का अध्ययन।
  3. कर्मज्ञान (Pharmacology): कर्म का अध्ययन (वातहर, पित्तहर)।
  4. प्रयोगज्ञान (Pharmacotherapeutics): रोगों में प्रयोग।
  5. योगज्ञान (Study of Formulation): औषधि योग (चूर्ण, क्वाथ)।
  6. कल्पनाज्ञान (Pharmaceutics): निर्माण विधि (अवलेह, आसव)।

4. द्रव्यगुण विज्ञान की परिभाषा (Definition of Dravyaguna Vigyana)

  • परिभाषा:
    “द्रव्याणां नामरूपाणि गुणकर्माणि सर्वशः। प्रयोगाश्च वर्ण्यन्ते यस्मिन् द्रव्यगुणं हि तत्।”

    • अर्थ: द्रव्यों के नाम, रूप, गुण, कर्म, और चिकित्सकीय प्रयोग का अध्ययन।
  • विवरण: यह शास्त्र औषधीय पदार्थों की पहचान, उनके गुणों का विश्लेषण, और रोग निवारण में उपयोग का विज्ञान है।
    • उदाहरण: हरड़ का मधुर विपाक और त्रिदोषहर प्रभाव।

5. द्रव्यगुण विज्ञान की चिकित्सा प्रयोग में भूमिका (Role of Dravyaguna Vigyana in Clinical Practice)

(A) औषधीय पदार्थों की पहचान और वर्गीकरण
  • Pharmacognosy:
    • औषधीय पौधों (शतावरी), खनिजों (शिलाजीत), जंतु उत्पादों (मधु) की पहचान।
    • गुणवत्ता और शुद्धता सुनिश्चित करना।
    • उदाहरण: नकली औषधि से बचाव।
(B) दवाओं के गुणों की समझ
  • गुण:
    • गुरु (पचने में भारी), लघु (हल्का), शीत (ठंडा), उष्ण (गर्म)।
    • प्रकृति और रोग के आधार पर चयन (उदा. पित्त रोग में शीत गुण वाली शतावरी)।
  • रस:
    • 6 रस: मधुर (पोषक), अम्ल (पाचक), कटु (शोथहर) आदि।
    • उदाहरण: कटु रस (सौंठ) शोथ और कफ कम करता है।
  • वीर्य:
    • शीत (पित्त शांत), उष्ण (वात-कफ शांत)।
    • उदाहरण: चंदन (शीत) पित्त ज्वर में उपयोगी।
  • विपाक:
    • पाचन के बाद प्रभाव (मधुर: पोषण, कटु: शोधन)।
    • उदाहरण: आँवला का मधुर विपाक दीर्घकालिक बल देता है।
  • प्रभाव:
    • विशिष्ट प्रभाव (उदा. अतिविष का विषहर प्रभाव)।
    • रसायन और वाजीकरण में उपयोग।
(C) औषधियों का निर्माण
  • योगज्ञान:
    • बहु-पदार्थ संयोजन (उदा. त्रिफला चूर्ण: हरड़, बहेड़ा, आँवला)।
    • निर्माण: चूर्ण, क्वाथ, अवलेह, आसव-अरिष्ट।
(D) चिकित्सकीय उपयोग
  • कर्मज्ञान:
    • दोष, धातु, मल पर प्रभाव (उदा. गुडूची का पित्तहर कर्म)।
  • प्रयोगज्ञान:
    • मात्रा, समय, विधि (मुख, त्वचा, नस्य)।
    • उदाहरण: नस्य में तेल का प्रयोग वात रोग में।
(E) रोग प्रबंधन
  • दोष साम्य:
    • वात (उष्ण द्रव्य), पित्त (शीत द्रव्य), कफ (कटु द्रव्य) संतुलन।
    • उदाहरण: सौंठ (उष्ण) वातहर, चंदन (शीत) पित्तहर।
  • रोकथाम और उपचार:
    • रोकथाम: रसायन (आँवला), वाजीकरण (अश्वगंधा)।
    • उपचार: तीव्र (ज्वर में गुडूची), दीर्घकालिक (क्षय में शतावरी)।
(F) सुरक्षा और प्रभावशीलता
  • गुणवत्ता नियंत्रण:
    • मानकीकरण से सुरक्षा (उदा. शुद्ध शिलाजीत)।
  • विकृति से बचाव:
    • गलत द्रव्य प्रयोग से दुष्प्रभाव रोकना।

6. द्रव्यगुण का महत्व और प्रयोजन (Importance and Objectives)

  1. चिकित्सा का मुख्य अंग: वैद्य के लिए आधारभूत।
  2. द्रव्य का महत्व: चिकित्सा के चतुष्पाद में “करण” (साधकतम कारण)।
  3. रोग प्रतिषेध: सही द्रव्य से रोग निवारण।
  4. आयुर्वेद प्रयोजन: दोष साम्य और स्वास्थ्य।
  5. आयुर्वेद परिभाषा में स्थान:
    “हिताहितं सुखं दुःखं आयुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते।”

    • द्रव्यगुण हित-अहित द्रव्यों का ज्ञान देता है।
  6. वैद्य के लिए आवश्यक:
    “निघण्टुना विना वैद्यो विद्वान् व्याकरणं विना।”

    • बिना द्रव्यगुण ज्ञान के वैद्य अधूरा।

संक्षेप

  • द्रव्यगुण विज्ञान: औषधीय पदार्थों का विज्ञान जो नाम, गुण, कर्म, और प्रयोग का अध्ययन करता है।
  • चिकित्सा में भूमिका: पहचान, गुण समझ, निर्माण, उपयोग, रोग प्रबंधन, और सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • ये नोट्स MCQ और संक्षिप्त तैयारी के लिए उपयोगी हैं।
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